Monday, 9 December 2013

शत वन्दित है

भारतीय नागरिकों को जीत की हार्दिक बधाई देते हुए एक गीत के दो बन्द प्रस्तुत हैं--

विजय पताका गगन चूमती हुई आज अभिनन्दित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है

दारुण कष्ट सहे इस धरती ने पिछले दस वर्षों में
हार गया जन जन था मन तब लगा नहीं संघर्षों में
तभी अस्त्र आ गया हाथ में मतरूपी फौलादी था
पटक दिया तुमने उसको जो दमन नीति का आदी था

पुष्प खिला है आज कमल भूमण्डल हुआ सुगन्धित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है

महंगाई पर अंकुश सबसे पहली मांग हमारी है
अनुच्छेद विघटनकारी की अब हटने की बारी है
एक नियम क़ानून सभी के लिए मान्य करना होगा
अम्ब भारती का हर संकट इसी भाँति हरना होगा

सुनो इसी के हेतु प्रजा ने किया तुम्हे अनुबन्धित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है

अड़चन सभी समाप्त करो अब तुम मन्दिर की नींव धरो
राजनीति के केन्द्र बिन्दु मोदी तुम आज उठो बिफरो
जन जन का सैलाब तुम्हारे साथ कि भगवा थाम चलो
एक बार फिर सनातनी तप की धारा में वीर जलो

भारत माँ को गर्व बड़ा सुत उनका महिमामण्डित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Tuesday, 26 November 2013

कण्टक

सदा धर्म जो रक्षकों का रहे पालते से अहोरात्र खोये हुए हैं
उन्हें भी बड़ी लालसा प्रेम की चित्त में प्रीति के बीज बोये हुए हैं
नहीं तृप्त हैं वे तभी वासना दन्त को ही युगों से चुभोये हुए हैं
रहे कण्टकों से सदा दूर क्यों चित्त में वे व्यथाएं संजोये हुए हैं

कहो बेर की डालियों से चुने बेर तो क्यों उन्हें साथ लाते नहीं हो
छुओ प्रेम से युक्त हो भावनायें उन्हें मोम सा क्यों बनाते नहीं हो
चुभें भूल से भी नहीं कष्ट दें ये उन्हें बन्धुओं क्यों बताते नहीं हो
सदा कण्टकों को रहे कोसते कण्ठ से क्यों उन्हें भी लगाते नहीं हो

शूल कहो न इन्हे यह तो विधि के अनुरूप सदा जलते हैं
दैव कहो इनका कि सदा हर मानव के उर को खलते हैं
वायु प्रवाह भयंकर हो तब मान पराजय ये चलते हैं
ये अपमानित से पथ में गिरते ढलते अथवा गलते हैं

अवरुद्ध किया पथ कण्टक ने नर में वह पौरुष को भरता है
तप के हित मानव को इस भाँति सदा यह प्रेरित सा करता है
यह जीवन क्लिष्ट करे तब मानव भी लड़ वैभव को वरता है
फिर भी उपकार न मान सका इसका उरताप नहीं हरता है

फलों को पकाया सुरक्षा सदा दी न कच्चा उन्हें शत्रु भी तोड़ पाया
कली को बचा के करे देवसेवा नहीं पुष्प सत्कर्म को छोड़ पाया
सदा धर्म के मार्ग को ही गहा तो नहीं सन्त से नेह क्यों जोड़ पाया
यही भाग्य का लेख ये कण्टकों ने बताया न कोई इसे फोड़ पाया

सदा दुर्दिनों को रहे झेलते कण्टकों की व्यथा तीक्ष्ण हैं ये  कड़े हैं
जहाँ कामिनी को छुआ प्रेम से चूनरी फाड़ दी लाज से ये गड़े हैं
इन्हे तो हटाया गया सत्पथों से यथा मान के दुष्ट सारे खड़े हैं
कभी छू सके हैं नहीं पाँव ये राम या कृष्ण के भी अभागे बड़े हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ




Monday, 21 October 2013

आपकी शरण हूँ

मोहक स्वरूप आपका निहारता सदैव......अम्ब अमरत्व हित आपकी शरण हूँ
धर्म कलिकाल में बता रहा मैं जग मध्य असफल किन्तु जैसे ग्रन्थ मैं करण हूँ
सत्य कहता हूँ ऋषि वचन उपेक्षित हैं......कर्मकाण्ड में सुविज्ञ होता का हरण हूँ
माँ प्रभाव कुछ तो प्रसार दो स्वशक्तियुक्त..देख अति पीड़ित स्वदेश का क्षरण हूँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Tuesday, 24 September 2013

शिरोधार्य है

एक छन्द मन्दारमाला........
आशीष देते रहे वो सदा पूर्वजों का यही पुण्यदा कार्य है
कल्याण की चाह ही वे करें देख लो चित्त का बन्धु औदार्य है
सम्मान के पात्र वे हैं सदा ये सिखाता नहीं एक आचार्य है
जानो सदा वेद आदेश को जो  तुम्हारे लिए ही शिरोधार्य है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Tuesday, 13 August 2013

कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

शत्रु चारों ओर से प्रहार है करे
एक भारतीय देख नित्य ही मरे
सत्ताधीश हमें लूट घर को भरे
पूर्ण चैन राष्ट्र का खड़े खड़े हरे
वीरता प्रसंग रहे धरे के धरे
लेखनी से निकलेंगे वचन खरे

शौर्य का उठो प्रवीण छेड़ राग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

सीमा पर शत्रु का जमावड़ा बड़ा
जाने क्यों न फूटे अब पाप का घड़ा
वीर आर्यपुत्र मोह छोड़ के लड़ा
किन्तु शीर्ष देश का है निष्क्रिय खड़ा
लज्जावश राष्ट्र लगा भूमि में गड़ा
लेना होगा तुम्हे आज फैसला कड़ा

राष्ट्र धर्म के निमित्त आशु भाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

आम्भि जयचन्द व ओवैसी बढ़ते
राजनेता स्वार्थ के कुपन्थ गढ़ते
राष्ट्रद्रोही घातकर्म पाठ पढ़ते
शेर पे तभी तो हैं सियार चढ़ते
भारती को डायन बताते कढ़ते
और दोष हम पे वो नित्य मढ़ते

सन्तति में वीरता के रस पाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Wednesday, 31 July 2013

तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा

दिव्य भाव का प्रवाह लेखनी करे सदैव शब्द शब्द शक्तिपात आर्यवीर में करे
तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा शरीर मध्य ओज शक्ति वीर्य तेज वो महानता भरे
शत्रु को विवेकहीन शक्तिहीन दे बना व धर्मद्रोह वृत्ति भूमि से वही सदा हरे
वेद वेद-अंग का प्रसार दिग्दिगन्त हो कि आर्यधर्म के लिए जिए मनुष्य या मरे
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Monday, 29 July 2013

शुभ दर्श दिखाओ

एक छन्द- मत्तगयन्द
आज चमत्कृत सा कर माँ इस जीवन में कुछ हर्ष दिखाओ
झंकृत वाद्य महाध्वनि भी किस भाँति उठे शत वर्ष दिखाओ
दो मुझको महनीय तपोबल .....भोग छटें प्रतिकर्ष दिखाओ
अम्बर आप अनादृत दो कर ..अम्ब मुझे शुभ दर्श दिखाओ
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Wednesday, 17 July 2013

खड़े हम हैं


हनु पर काला तिल और लाल ये कपोल
मस्तक चमक रहा अक्षि मीन सम हैं
उर तन्त्रिका के सभी तार झंकृत हुए हैं
दन्तपंक्ति किंचित न मौक्तिकों से कम हैं
धनु के कमान जैसी भवें लख चकित हूँ
इन्दु मंजु आभा मुख निशायें पूनम हैं
अब न विलोक किसी और को प्रियम्वदे तू
तेरी दृष्टिपात याचना में खड़े हम हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Monday, 15 July 2013

गणात्मक घनाक्षरी (आशुतोष छन्द)



वेदना अपार चित्त में भरी हुई कि हाल दीन का बुरा मनुष्यता रही न शेष है
राजनीति भ्रष्ट राष्ट्र शत्रु से कुद्रष्ट कष्ट में पड़ी स्वभूमि देख व्याप्त मात्र क्लेश है
धर्म क्षेत्र में अधर्म का प्रसार है विराट और धर्म केतु जीर्ण शीर्ण क्षुद्र वेश है
काल आ गया कि आर्य त्याग दे प्रमाद आज भारती पुकारती पुकारता स्वदेश है

मित्र हो अदम्य साहसी उठो स्वचाप धार तीर वृष्टि हो अतीव तीव्र शत्रु वक्ष पर
वक्र दृष्टि आसुरी भले रहें परन्तु ध्यान ये धरो कि आर्यवीर श्रेष्ठ एक लक्ष पर
भोग और राष्ट्र द्रोह में निमग्न दुर्ग देख आज ही करो प्रहार दुष्ट भ्रष्ट कक्ष पर
ओज शौर्य शक्ति दो दिखा महान धर्म हेतु  पूर्ण विश्व घूमने लगे स्वराष्ट्र अक्ष पर
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ 

Thursday, 11 July 2013

माह रमजान

राजा राम के ही ध्यान का है माह रमजान उनके ही ध्यान साधना में डूब जाओ तुम 
रोज़ा व्रत उपवास नाम चाहे जो भी दे दो किन्तु मास यही बन्धु हर्ष से मनाओ तुम 
वेदपाठ करो या कि गुरुवाणी पढो या कि पढ़ के तराबी मानवीय गीत गाओ तुम 
विश्व उग्रवाद से भले न लड़ पाए किन्तु उग्रवादियों को एक हम हैं दिखाओ तुम 
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 10 July 2013

आर्याह्वान


महाकष्ट में जन्मदात्री हमारी सुधा का तभी दिव्य प्याला लिए हूँ
अरे ध्यान दो शक्ति का पुञ्ज हो भारती के लिए पुष्पमाला लिए हूँ
उठो आर्य वीरों तुम्हे दे सकूँ मै महाशक्ति से युक्त भाला लिए हूँ
नहीं चूकना है मुझे हाथ में मै महाक्रान्ति की रौद्र ज्वाला लिए हूँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Tuesday, 9 July 2013

भारत माँ हित ही गहना है

अति सीमित होकर के सुन लो जग मध्य नही हमको रहना है
सम वायु प्रवाह समग्र धरा हमको अब निश्चित ही बहना है
असुरत्व प्रसारित, दुर्ग सुनो इसका क्षण ही भर में ढहना है
तप योग व ज्ञान व मानवता शुचि भारत माँ हित ही गहना है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Sunday, 7 July 2013

महा-अभिषेक करेंगे

हम सेवक जीवन अर्पित माँ, हित धर्म सुकर्म प्रत्येक करेंगे
यह विश्व समस्त बना कर आर्य, विनष्ट सदा अविवेक करेंगे
जन से जन का हम कण्ठ मिला, वसुधा भर को फिर एक करेंगे
कुछ धैर्य धरो हम भारत माँ! तव राज्य महा-अभिषेक करेंगे
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Friday, 5 July 2013

हम पोषक हैं तुम मारक हो

एक डॉक्टर साहब जिनको आप सभी जानते हैं, उन्हें मेरा जवाब-----

हम उत्सव के क्षण नित्य गहें तुम रोदन के क्षण धारक हो
हम आत्म निरीक्षण में रत हैं तुम आसुर वृत्ति प्रसारक हो
पुरुषार्थ पथी हम हैं समझो तुम पाप कुकर्म विचारक हो
हमसे अपनी तुलना न करो हम पोषक हैं तुम मारक हो

शुचिता हमको प्रिय है तुम तो कटु सत्य अशौच प्रचारक हो
अभिमान हमें निज माँ पर है भगिनी तक के तुम हारक हो
तप त्याग सुमन्त्र पढ़ें हम तो तुम भोग सदा व्यवहारक हो
हमसे अपनी तुलना न करो हम पोषक हैं तुम मारक हो

हम मानवता हितचिन्तक हैं तुम घोर अमंगल कारक हो
हम रक्षण में रत हैं जग के तुम तो घनघोर प्रहारक हो
जड़ जंगम में हम ईश लखें करते तुम कर्म विदारक हो
हमसे अपनी तुलना न करो हम पोषक हैं तुम मारक हो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Wednesday, 26 June 2013

विवेकबुद्धि योग में रही


कालिमावसाद की प्रचण्ड रूप धार आज देख लो मनुष्यते! महान कष्ट दे रही
मानवीयता व धर्म का स्वरुप मेट देख अर्थ को प्रधान मान प्राण मूल्य ले रही
साधु में न साधुता तमोगुणी हुए समस्त सिन्धु की सुता प्रसार भाव लोभ के रही
जाग आर्य! जाग! तू महान है बली अपार ज्ञान भी तुझे विवेकबुद्धि योग में रही
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Tuesday, 25 June 2013

अधर्म के विनाश को

वन्दन विशेष-----
लेखनी चले अबाध राष्ट्रद्रोह के विरुद्ध और विश्व जान ले सनातनी प्रकाश को
त्याग दे समस्त लोक ये अकर्म या विकर्म और दे महत्त्व धर्मकर्म के पलाश को
आर्यवीर हो समर्थ ओज वीर्य तेज युक्त माँ उमंग भाव आज आप दो हताश को
अम्ब शारदा कृपा करो भरो महान शक्ति शब्द शब्द शस्त्र हों अधर्म के विनाश को
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Monday, 24 June 2013

पूनम की रजनी

यह पूनम की रजनी प्रिय है स्वर गूँज रहे तव पायल के
रजनीश लखें अति व्याकुल हो मधु शीतल आज पियें जल के
हरते वह शील रहे बचना ऋषि पीड़ित थे इस भूतल के
यह पावस की ऋतु है इसमें रति काम सुधा बन के छलके
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Wednesday, 19 June 2013

नेह सुधा छलके

सिंहावलोकन में दुर्मिल सवैया---

छलके ममता जब आँचल से शुचि काव्य प्रसाद तभी झलके
झलके उर भक्ति सुनो प्रिय माँ जब छन्द प्रबन्ध न हों हलके
हलके हलके मुंदतीं पलकें रसपान करें तव सम्बल के
बल के न कठोर प्रयोग बढें वर दो बस नेह सुधा छलके
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

जानते थे ये रहस्य

वीर्य नाश में निमग्न मानवीयता है भग्न किंचित महत्त्व भी मिले न शुद्ध नेह को
यौवन अपार शक्तियुक्त किन्तु काम नित्य, क्षीण ही करे समग्र मानवीय देह को
आर्य ये रहस्य जान हुए बड़े मेधावान धार ब्रह्मचर्य कहें सेव्य अवलेह को
कारण यही था तब जीवन सहस्त्र वर्ष आज मिलता नहीं शतायु किसी गेह को
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Sunday, 16 June 2013

सनातनी प्रभाव छलके

एक सिंहावलोकन छन्द

छलके ममत्व पुत्र को मिले कवित्व शक्ति, शारदे! प्रसाद रूप छन्द मिलें ढल के
ढल के न सूर्य भी प्रकाश दे, कि मृत्यु पूर्व- चाह पूर्णता मिले भले मिले मचल के
चल के तुरन्त ही समीप आओ अम्ब आप, बुद्धि मरुभूमि में प्रसून हों कमल के
मल के अनेक दिव्य लेप आत्म कोश मध्य, रोम रोम से सनातनी प्रभाव छलके
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Thursday, 13 June 2013

सुवर्ण की लता दो माँ

अम्ब वन्दना के छन्द बनते नही हैं आज मुझसे अपार तुम रुष्ट क्यों बता दो माँ
वन्दना बिना है लेखनी भी अवरुद्ध मेरी ममता छिड़कती हो  इतना जता दो माँ
चाहता वसुन्धरा बनी रहे सनातनी ये इस हेतु धर्मराज का मुझे पता दो माँ
जागृत हों भारती के श्रेष्ठ पुत्र इस हेतु लेखनी से लिखवा सुवर्ण की लता दो माँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 12 June 2013

भो सविता!

एक कुण्डलिया छन्द ..

सविता के हम पुत्र हैं, दिव्य हमारा तेज
पर क्षमता कम हो गई, प्रिय हमको अब सेज
प्रिय हमको अब सेज, संग भी मात्र प्रिया का
वेदशास्त्र को भूल न लेते नाम सिया का
राष्ट्र जगे इस हेतु लिखूँ मै नियमित कविता
इसमें कुछ सहयोग करो तुम भी भो सविता!
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

दायित्वों से मत भागो

तुम्हे पुकारे भारत माता उठो वीर अब तो जागो
द्रोही घाती बढे बहुत हैं दायित्वों से मत भागो

कैसा शासन लोकतन्त्र कैसी परिपाटी बोलो तो
क्या थे हम क्या हुए जा रहे निज गौरव को तोलो तो
वीर शिवा राणा झाला की मातृभूमि सिसकी भरती
चक्र सुदर्शन हाथ धरो अवरुद्ध मार्ग को खोलो तो

तप का जीवन सदा श्रेष्ठ है उसे न किंचित भी त्यागो
द्रोही घाती बढे बहुत हैं दायित्वों से मत भागो

छोड़ पराक्रम काम अश्व को ढीला ढाला छोड़ दिया
क्यों लैला मँजनू शीरी फरहादों से मन युक्त किया
लव कुश अर्जुन भीम कर्ण की क्यों तुमको है याद नहीं
काले बालों गोरे गालों ने पौरुष क्यों लूट लिया

कवच ढाल का ही विष्टर हो अब गद्दों को मत तागो
द्रोही घाती बढे बहुत हैं दायित्वों से मत भागो

देखो शैलराज घायल हैं घायल पडी भारती हैं
फिर भी अपनी ममता तुम पर देखो नित्य वारती हैं
काल आ गया उस ममता का वीलों मोल चुका दो तुम
यही तुम्हारी श्रद्धा होगी यही सहस्त्र आरती हैं

कुण्ड प्रज्ज्वलित करो रक्त की अर्पित कर दो हवि यागो
द्रोही घाती बढे बहुत हैं दायित्वों से मत भागो

तुम्हे पुकारे भारत माता उठो वीर अब तो जागो
द्रोही घाती बढे बहुत हैं दायित्वों से मत भागो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Monday, 10 June 2013

राष्ट्रवाद कैसा हो गया

अडवानी के इस्तीफे पर  भारतवंशियों की त्वरित प्रतिक्रिया........

भारती ये राष्ट्रवाद कैसा हो गया लगता है स्वार्थवाद जैसा हो गया
मोदी देश के बने हैं ज्यो ही सम्बल
गैर दुखी और गया अपनों को खल
कैसी ये विडम्बना है दुःख के हैं पल
साथ छोड़ अडवानी कहाँ दिए चल
राष्ट्र था प्रसन्न पर्व ऐसा हो गया किन्तु घातनीति पद पैसा हो गया
भारती ये राष्ट्रवाद कैसा हो गया लगता है स्वार्थवाद जैसा हो गया
दल के पितामह हैं अब भी अटल
शरण गहो उन्ही की निकलेगा हल
अन्यथा तुम्हारा सुनो क्षीण होगा बल
फिर बोलो कैसे खिल पायेगा कमल
ये कदम यम वाला भैंसा हो गया चाहते विपक्षी जो थे वैसा हो गया
भारती ये राष्ट्रवाद कैसा हो गया लगता है स्वार्थवाद जैसा हो गया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Sunday, 9 June 2013

त्रिलोक व्याप लेंगे हम

कैसा भी तिमिर हो अमावसी प्रभाव लिए निश्चित है गहराई पूरी माप लेंगे हम
ज्ञानवान हो सकेगा एक दिन कण कण ढोलक से उत्सवी सुदिव्य थाप लेंगे हम
देखना गभस्ति का प्रसार इतना करेंगे पौरुष प्रकाश से त्रिकाल नाप लेंगे हम
सत्व रज तम का बना के सन्तुलन फिर सत्य है कि पूर्ण ये त्रिलोक व्याप लेंगे हम
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Friday, 7 June 2013

विप्र उठो संकल्प लो

पाप बढ़ा तुम रोक लो करो तपस्या आज
विप्र उठो संकल्प लो धर्म करे अब राज !!दो०!!१

विप्र तपे यदि जीवन में तन में तब निश्चित रोग नहीं हैं
विस्मृत यों न करो तुम ज्ञान तुम्हे कब सिद्ध प्रयोग नहीं हैं
आज प्रलोभन हैं इतने जग में जितने कुल भोग नहीं हैं
सोच धरा पर पालन धर्म करें दिखते वह लोग नहीं हैं

है अभक्ष्य जो त्याग दो मत खाओ तुम प्याज
विप्र उठो संकल्प लो धर्म करे अब राज !!दो०!!२

मस्तक चन्दन भूषित हो शुचि वेद ऋचा रसना नित गाये
नित्य शिवत्व बढे तव जीवन मानवता हित गीत सुनाये
आसुर वृत्ति दबे तुमसे शठ साहस ही न कभी कर पाये
भारत हो द्विज सोच अखण्ड व आर्य ध्वजा फिर से लहराये

आर्य धरा पर फिर सुनो गिरे न कोई गाज
विप्र उठो संकल्प लो धर्म करे अब राज !!दो०!!३

दान करो नित ज्ञान समस्त प्रबन्धन भी जग को सिखलाओ
एक मनुष्य नहीं हर जीव महत्त्व रखे यह बात बताओ
शोषण ठीक नहीं तुम भूसुर हो हर शोषक को समझाओ
जो ऋषि वाक्य उन्हें अपनाकर पूर्ण धरा तुम आर्य बनाओ

होगा हर दिन पर्व फिर नित्य सजेगा साज
विप्र उठो संकल्प लो धर्म करे अब राज !!दो०!!४
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Thursday, 6 June 2013

बस मानव


अमरत्व प्रदायक पायस को...... इतिहास कि पा सकता बस मानव
गिरिराज उठा कर के अंगुली पर...... विश्व हिला सकता बस मानव
सुन कार्य न एक असम्भव है..........पुरुषार्थ बढ़ा सकता बस मानव
फिर द्वेष विनाशन ही जग को प्रिय क्यों न सिखा सकता बस मानव
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Wednesday, 5 June 2013

वीरता कहाँ गयी


क्यों अधर्म का प्रसार आर्य भूमि मध्य आज धर्म वृद्धि वाली वो कहो लता कहाँ गयी
काल को भी जीत लेने वाला दुष्ट मार दिया बोल युद्ध वाली वो प्रवीणता कहाँ गयी
कहाँ गयी कालिया को नाथने की शक्ति और वज्र देह दान नीति भी बता कहाँ गयी
अंशुमान वाली वो महान ज्वाला उदरस्थ कर जो सके बता वो वीरता कहाँ गयी
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

प्रिये सींचो

मुझे कस लो सुनो भुजपाश में बस जोर से भींचो
अतल उर के हमारे घाव को औषधि बनो खींचो
विषैले बाण अन्तस को निरन्तर छेद देते हैं  ....
अरे उर वाटिका को नेह से कुछ तो प्रिये सींचो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Tuesday, 4 June 2013

क्यों न ज्ञान हो रहा

राम के समान जग में न कोई और बन्धु
किन्तु नाम का ही आज अपमान हो रहा
ब्रह्म का स्वरुप हैं परन्तु ये विडम्बना कि
असुरों से युक्त कर राम गान हो रहा
सीता राम है महान मन्त्र इसको बिसार
बार बार व्यर्थ साईं राम ध्यान हो रहा
राम के पगों की एक अंगुली के एक नख
के समान भी नहीं वो क्यों न ज्ञान हो रहा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Monday, 3 June 2013

जीवन बदल गया

देखते ही देखते ये जीवन बदल गया, और बदला है मम राष्ट्र परिवेश भी 
कोई चीर से विहीन करता सरस्वती को, कोई खींचने लगा है जननी के केश भी 
आँधियाँ चली हैं द्रोह की समग्र विश्व आज, घोर तम से घिरे हैं देख लो दिनेश भी 
शक्तिहीन से लगें सनातनी समस्त देव, और अपशब्द झेलते हुए महेश भी 
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Sunday, 2 June 2013

काजल है


प्रिय ध्यान धरूँ तुमने उर पे अधिकार किया वह घायल है
यह सत्य प्रिये तव जीवन ही मम जीवन का शुचि सम्बल है
शशि के सम है मुख मंजु प्रकाशित मग्न हुआ यह भूतल है
मुझको वश में कर ले तव रूप अनूप बना कर काजल है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Friday, 31 May 2013

सम्बल हमारा हो

तुम्ही हो प्राण मेरे श्वांस भी अस्तित्त्व सारा हो
तुम्ही पूजन हवन सत्कर्म या सम्बल हमारा हो

तुम्हारा मुस्कराना ही मुझे संस्पर्श जैसा है
न पूँछो आज मेरे चित्त का व्यवहार कैसा है
तुम्ही देती मुझे हो कथ्य में अंगार से चुम्बन
कसी भुजपाश में हो कामना है स्वप्न ऐसा है

उड़ी जो लट तुम्हारी तो लगे ये मेघ हारा हो
तुम्ही पूजन हवन सत्कर्म या सम्बल हमारा हो

नयन के वार से घायल ह्रदय होकर सुनो पुलके
चमत्कारी तुम्हारे हाथ के होते प्रिये फुलके
तुम्हारे संग में लगता मिला है इन्द्र सम सुख भी
तभी तो गीत गाता हूँ तुम्हारे ही सदा खुल के

तुम्ही ध्रुव सम सुनो इस सृष्टि में शुचि एक तारा हो
तुम्ही पूजन हवन सत्कर्म या सम्बल हमारा हो

निरन्तर चाहता मन है प्रफुल्लित सी रहो हर क्षण
सदा आशीष देकर कष्ट हर लें देव देवी गण
कवच बन कर रहूँ तत्पर तुम्हे आनन्द से भर दूँ
हमारी प्रीति की गाथा कहे जग में प्रिये कण कण

बनें तेरा सहारा हम हमें तेरा सहारा हो
तुम्ही पूजन हवन सत्कर्म या सम्बल हमारा हो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Wednesday, 29 May 2013

वाणी वन्दन

माँ प्रणाम भाव के सुमन आज अर्पित हैं
भाव सप्तनद का सरस जल हो गया
भाव से निकलती है वन्दना तुम्हारी अम्ब
भाव ही तुम्हारे पद पंकजों को धो गया
भाव की ही भूख तुमको भी ये सुना है नित्य
आज उर भावसिन्धु मध्य कहीं खो गया
भाव का ही नवनीत खोजता हूँ भोग हेतु
भक्तिभाव हर्ष वृष्टि से मुझे भिगो गया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

अग्रगण्य अग्रपूज्य गणपति को समर्पित दो छन्द



जो पितु कण्ठ भुजंग दिखें वह शुण्ड उठा निज कण्ठ फिराते
मस्तक इन्दु लखें मचलें फिर क्रोधित हों शशि भूमि पठाते
गंग जटा डमरू कर में लख के डम की ध्वनि संग नहाते
बाल गणेश पिता शिव के उर हर्ष भरें सुत धर्म निभाते

देख शिवत्व महागणनायक भी करते शिव सी हर लीला
शुण्ड भरें जल, शीश धरें, कि उछाल करें गिरिमण्डल गीला
जो वृषवाहन दृष्टि पड़े, मुख मूषक में रख मोदक पीला,
घोर अमंगल नष्ट करें पथ कोमल सा कर दें पथरीला
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Monday, 27 May 2013

दे विधान भी कड़े कड़े

चीन ने भारतीय सीमा के अन्दर घुसकर ५ किलोमीटर लम्बी सड़क बनाई....तब कवि को लेखनी उठानी पड़ती है.......जागरण के लिए.....
1
भारती महान किन्तु अन्धकार का वितान, है अमा समान ज्ञान का नहीं प्रसार है
द्रोह वृद्धि की कमान, भ्रष्टनीति की मचान, क्यों सजी हुई कि स्वाभिमान तार तार है 
मानवीयता न ध्यान, पाप पुण्य व्यर्थ मान, दानवी मनुष्य का मनुष्य पे प्रहार है 
धर्म का रहा न मान, रुग्ण आँख नाक कान, शत्रु का लखो विवेक नाश हेतु वार है
2
क्यों नपुन्सकी प्रवृत्ति का प्रसार बार बार, और राष्ट्र शत्रु हौसले लिए बड़े बड़े
अंडमान के दिए गए उसे अनेक द्वीप, रो रहा त्रिवर्ण केतु क्यों दिया बिना लड़े
भीरु संसदीय कार्यपालिका बनी अपार, प्रश्न तो महत्त्वपूर्ण आज ही हुए खड़े
त्याग लोकतन्त्र वीर हाथ में संभाल राज्य देश के निमित्त दे विधान भी कड़े कड़े
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 22 May 2013

प्रहार ये प्रचण्ड है


खण्ड खण्ड में विभक्त है मनुष्यता अपार
आसुरी प्रवृत्ति का प्रहार ये प्रचण्ड है
आ रहा समक्ष भी न देव शक्ति का प्रभाव
दुष्ट को प्रताड़ना विधान या न दण्ड है
सन्त हीन है समाज, शक्तिवान में प्रभूत --
आज देख लो सखे बढ़ा हुआ घमण्ड है
भारती अपंग हो गई सुनो परन्तु मित्र
घोष हो रहा कि राष्ट्र नित्य ये अखण्ड है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Monday, 20 May 2013

क्यों क्लीवत्व नदी बहती


सुनो बली है भारत भू अन्याय नहीं किंचित सहती
सत्ता के गलियारों में तब क्यों क्लीवत्व नदी बहती
सच मानो हर मन में हमको क्रान्ति जगाना आता है
पाक बंग या चीन सरीखों को समझाना आता है
सत्य धर्म की रक्षा में हैं प्राण दान भी दे देते
तुष्ट करे रणचंडी को वो चक्र चलाना आता है
वक्र दृष्टि हो जाये हम पर जो वो दृष्टि नहीं रहती
सत्ता के गलियारों में तब क्यों क्लीवत्व नदी बहती
राष्ट्रवाद बलवान बड़ा है तभी सुनो यह देश टिका
पर क्षत्रप डरपोक बड़ा या दो कौड़ी के मोल बिका
तभी शत्रु मेरे घर में घुसकर अधिकार जताता है
ज्ञानी कह देते प्रभाव भी जाने इसको क्यों कलि का
भारत माँ वीरता त्याग को कभी नहीं सुन लो कहती
सत्ता के गलियारों में तब क्यों क्लीवत्व नदी बहती
ये आह्वान सुनो मेरा है उठो भारती पुत्र चलो
वक्ष चीर दो आज शत्रु का और शीश उसका मसलो
अंशुमान की अग्नि तपाये या हिमगिरि दे हाड़ गला
किन्तु निराशा में आकर तुम मत अपने यों हाथ मलो
ये विवेक से युक्त शक्ति है नहीं किसी को भी डहती
सत्ता के गलियारों में तब क्यों क्लीवत्व नदी बहती
झाला बोला आज स्वर्ग से बोल पडा राणा सांगा
मिला मात्र अधिकार उसी को जिसने लड़कर के माँगा
क्या भिक्षा में पाण्डुपुत्र ले पांच गाँव भी पाए थे
उठा न क्यों यमदण्ड शीश अरि क्यों न उसी पर था टांगा
त्याग तपस्या योग यहीं पर मित्र तरंगित हो लहती
सत्ता के गलियारों में तब क्यों क्लीवत्व नदी बहती
सुनो बली है भारत भू अन्याय नहीं किंचित सहती
सत्ता के गलियारों में तब क्यों क्लीवत्व नदी बहती
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Friday, 17 May 2013

काव्य साधना


काव्य साधना न व्यर्थ है कभी सदैव जान ये मनुष्य को सदा मनुष्यता सिखाती है
शारदा कृपा विशेष हो तभी मिले कवित्व छन्दसिद्धि देवतुल्य आज भी बनाती है
दीन या निराश चित्त में यही भरे उमंग और अंग अंग मध्य चेतना जगाती है
छन्द शास्त्र ज्ञान युक्त जो हुआ प्रवीण मित्र ये विधा महान मोक्ष भी उसे दिलाती है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Thursday, 16 May 2013

प्रणाम है


नष्ट हो बनारसी प्रभात का प्रभाव चाह,
द्रोह से बची अयुद्ध क्षेत्र की न शाम है
और वन्दना विरोध व्यर्थ वे करें सदैव,
किन्तु रुद्ध भी उन्हें न चाँदनी न घाम है
माँ महान ये कुपुत्र को वरे, करे प्रदान,
किन्तु क्यों दुराग्रही कृतघ्नता सकाम है
मै ऋणी अपार, वन्दना करूँ, रहूँ कृतज्ञ,
भारती तुझे सदैव दास का प्रणाम है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 15 May 2013

तुलसीवन है



सकुटुम्ब रहें


जनतन्त्र कलंकित

छल शक्ति बड़ी जग में जिससे हर बार परास्त हुआ बल है
कलि में बस सत्य यही सुन लो सबसे बढ़ के मति कौशल है
सरकार गई यह जान तभी जनता लुटती न कोई हल है
जनतन्त्र कलंकित घोर लखो अति पीड़ित ये वसुधातल है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी 
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Tuesday, 14 May 2013

चिंतन के धरातल पर एक मुक्तक


कभी विचारो सत्य विकट है हम तो सब सुख पाते हैं
किन्तु त्यागते धर्म सनातन और नहीं पछताते हैं
मेरे जो आराध्य राम हैं बंदीगृह में पड़े हुए
हम सोते ए. सी. में प्रभु जी तम्बू में सो जाते हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Monday, 13 May 2013

शिव का समन्वयवाद




मस्तक सोम धरा विष कण्ठ, न वैर यहाँ शिव ने पनपाया
शीश धरा निज गंग परन्तु ,न नेत्र तृतीय खुला न जलाया
वाहन सिंह दिया निज संगिनि, तो वृष ही अपने हित भाया
आज समन्वय चाह रहा यह भारत जो शिव ने सिखलाया

कण्ठ भुजंग अनेक पड़े, शिव चन्दन हैं, विष व्याप न पाया
पुत्र किये द्वय युक्त मयूर व मूषक से, न विरोध जताया
वैर महा जिनमे, उनको अपना कर के, गिरि धाम बसाया
आज समन्वय चाह रहा यह भारत जो शिव ने सिखलाया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

घोटाला आदर्श है

जो परम्परा है भारतीय श्रेष्ठ ही सदैव विश्वानुकरण हेतु ढला आदर्श है
नारी देवी नर राम रूप ही रहा है यहाँ एक एक यहाँ की सुकला आदर्श है
आज कलि का प्रभाव छा रहा है घोर तम खोज वीर कहाँ गया भला आदर्श है
कोयला है, चारा, टू ज़ी, थ्री जी, सी डब्ल्यू जी, तोप आज इस भूमि मध्य घोटाला आदर्श है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Sunday, 12 May 2013

तू समर्थ है


1
जान 'प' से है पवित्र 'र' से रचना करे जो', शु' से शुभता लिए परशु का ये अर्थ है
'रा' से राजनैतिक और 'म' से मर्यादायुक्त राम को न जाने यदि जीवन ही व्यर्थ है
विप्रवंश नायक ने जो दिखाया मार्ग श्रेष्ठ, देख, जाग विप्र आज हो रहा अनर्थ है
ले  उठा ध्वजा सनातनी संभाल राजनीति श्रेष्ठ कार्य हेतु एकमात्र तू समर्थ है
2
शूकरों का परिवार करे उर पे प्रहार कहे खाते विष्ठा भारती को भी खिलाएंगे
माँ बहन अपनी भी रखते रखैल सदा 'वन्दे मातरम' वाला गान नहीं गायेंगे
क्लीव सांसदों से हमे कोई अब आस  नहीं जागे हम पुत्र भारती के हैं बताएँगे
भूल गया गुजरात द्रोहियों का है समाज पूर्ण राष्ट्र में सुकृत्य वही दोहराएंगे
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Friday, 10 May 2013

भारती अम्ब है

सजाया गया भाल दे के लहू भारती अम्ब है नित्य गाया गया
सदा वन्दना है ध्वजा की  स्वरों में  हमें स्वाभिमानी बनाया गया
यही राष्ट्र है आर्य भू वेद का घोष भी तो यहीं पे सुनाया गया
हमें तो पता भी नहीं द्रोह का वृत्त कैसे यहाँ खींच लाया गया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

क्यों न अभीष्ट दिया


घोर दयामय हो प्रभु जी  नृप तुल्य कृपावश भृत्य किया
अज्ञ सुविज्ञ बना तुमने प्रतिभा हर दे कृतकृत्य किया
पंगु बना तब श्रृंगजयी हर शैल धरा पर नृत्य किया
क्यों न अभीष्ट दिया मुझको तव ध्यान धरा श्रम नित्य किया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Thursday, 9 May 2013

माँ की महानता का एक चित्र देखिये


पुलक उठा था तन मन अंग अंग मेरा जब प्रिय पुत्र गर्भ मध्य तू समाया था
पद जननी का किया तूने ही प्रदान मुझे थी अपूर्ण पूर्ण मुझे तूने ही बनाया था
हँस हँस के सदैव लोरियां सुनाईं तुझे निज तुष्टि हेतु तुझे वक्ष से लगाया था
जग कहे ऋणी पुत्र को सदैव माँ का किन्तु ऋणभार तूने पुत्र मुझपे चढ़ाया था
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Wednesday, 8 May 2013

बढे फिर युद्ध पिपासा


और नहीं प्रिय दो मुझको तुम झूठ भरी अब व्यर्थ दिलासा
धर्म गया तप योग गया मन भारत का लगता अति प्यासा
वार प्रचण्ड करे अरि देख बढ़ा तम है हर ओर कुहासा
आज जगे फिर से यह भारत घोर बढे फिर युद्ध पिपासा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

ब्रह्म दिखे


लोभ न मोह न मत्सर हो तपनिष्ठ रहे यह जीवनधारा
मुक्त रहूँ बस तत्त्व गहूँ भवबन्धन काट मिले छुटकारा
हो धृति और क्षमा दमनेन्द्रिय मानवता हित चिन्तन सारा
ब्रह्म दिखे जड़ चेतन में कुछ भेद न हो अपना व तुम्हारा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Tuesday, 7 May 2013

सैनिक संगिनि


सैनिक युद्ध निमित्त गया निज प्राण चला वह दांव लगाने
राष्ट्र महाऋण जो उसपे हर मूल्य चला वह आज चुकाने
वन्दन है अभिनन्दन है जग में अमरत्व चला वह पाने
वीर महा उसकी वह संगिनि पीर नहीं जिसकी जग जाने
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Monday, 6 May 2013

गणपति सुनो


अग्रपूज्य गणपति सुनो करूँ ब्रह्म का बोध
लिख कर कर दूँ व्यक्त भी रंच न हो अवरोध

प्रथम वन्दना आपकी रिद्धि सिद्धि के संग
पूर्ण करो संकल्प यह हो न सके व्रत भंग
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

यही तन्त्र उसे भाता है

सर्वश्रेष्ठ है विशाल भारतीय लोकतन्त्र पूर्ण विश्व मुक्त कन्ठ गान यही गाता है

 राष्ट्रभाव एक एक व्यक्ति में भरा हुआ है मान्यता कि पूर्ण देश भूमि नहीं माता है 

यद्यपि घोटाला भ्रष्टाचार भी बढ़ा अतीव किन्तु लोकतन्त्र यहाँ प्राण का प्रदाता है

 भारत का मतदाता है महान जागरूक इसीलिए मात्र यही तन्त्र उसे भाता है

 रचनाकार

डॉ आशुतोष वाजपेयी

ज्योतिषाचार्य

 लखनऊ 

कुलोत्थान को


धारते धनुष बाण आसुरी विनाश हेतु पीत वस्त्र धारते हो देव कुलोत्थान को
पुण्डरीक के समान नेत्र वाले श्याम वर्ण करता प्रणाम रघुवंश वाली आन को
भो! अजानबाहु वाम जानकी करूँ प्रणाम उनके सहित तव सेवी हनुमान को
चाहता हूँ वेद ऋचा गूँजती रहे सदैव नष्ट कर दो तुरन्त आसुरी विधान को
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Sunday, 5 May 2013

असुर लूटते लाज


करे न द्रोही पुत्र को भारत माँ स्वीकार
श्राप भयंकर दे चुकी शेष दण्ड का वार

है प्रधान मन्त्री सुनो भारत का जब मौन
सेना को निर्देश दे तब फिर बोलो कौन

भीरु बने जीते रहे तो जीना है व्यर्थ
राष्ट्र हेतु बलिदान दो जीवन का तब अर्थ

बढ़ो बन्धु पुरुषार्थ को तो पाओगे ध्येय
भोगो में रत हो नहीं सुरा त्याज्य है पेय

उठो वीर जागो करो धर्मकर्म विस्तार
असुर प्रभावी हो रहे वे धरती पर भार

जननी धरती भी सुनो पुत्र पुकारे आज
तुम निष्क्रिय बैठे तभी असुर लूटते लाज

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

कुटुम्बियों ने ही बनाया है


क्रोध में अपार सिंहनी समान रूप धार
बोल पडी संगिनी मुझे सदा सताया है
काव्य साधना पथी बना रहा सदैव बोल
एक भी छदाम किन्तु क्यों नहीं कमाया है
एक लेखनी धनी दिखा मुझे मनुष्य मूर्ख
जो कि धनिकों के गेह जा के जन्म पाया है
और जो प्रसिद्धि पा गए उन्हें प्रसिद्ध भी तो
उनके धनी कुटुम्बियों ने ही बनाया है
रचनाकार
डॉ आशुतोष  वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Friday, 3 May 2013

कुछ दोहा छन्द


कुछ दोहा छन्द  प्रस्तुत हैं-----

कभी कभी मन में उठें प्रश्न बड़े गम्भीर
उत्तर प्राप्त न हो सकें बढ़ती जाती पीर

स्वार्थ बढ़ा जग में बड़ा द्रोह करें जन आज
भ्रष्टाचारी हो गया पूरा श्रेष्ठ समाज

सीमा पर घुसपैठ है शत्रु बना है चीन
भारत क्यों पुरुषार्थ से आज लग रहा हीन

क्यों प्रसार में है सफल आसुर पन्थ व काम
रावण घर घर में बढ़े कब आओगे राम

प्रभु इतनी सामर्थ्य दो धरा बना दूँ आर्य
कलियुग में यद्यपि कठिन लगता है यह कार्य

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य, लखनऊ

Thursday, 2 May 2013

क्यों वीर हो रोध में


क्या हो रहा राष्ट्र में देख लो लोग आते नहीं क्यों कभी क्रोध में
क्यों भूल के दिव्य आर्यत्व को हैं लगे व्यर्थ के आसुरी शोध में
हुँकारती भूमि जो थी सदा आज क्यों तुष्ट है शान्ति के बोध में
पन्थी बनो वीरता पन्थ के नष्ट हो शत्रु क्यों वीर हो रोध में
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

प्राण त्याग के चला गया



स्वाभिमानहीन कार्यपालिका लखो कि देश को चला रही कुतथ्य वक्ष को जला गया
और आसुरी प्रहार हो रहे अनेक बार किन्तु राजनीति देख टूट हौसला गया
राक्षसी प्रवृत्तियुक्त शूकरों को मृत्युदण्ड दे दिया इसीलिये जवान वो छला गया
व्यर्थ दंश झेलता रहा अनेक वर्ष नेक सर्वजीत हाय प्राण त्याग के चला गया

सर्वजीत क्या गया चली गई कि आस साथ लोकतन्त्र देश का रहा नहीं हमारा है
ये प्रधान भी नपुन्सकी प्रवृत्ति युक्त बन्धु लूट लूट के हमें बना रहा बेचारा है
भारती सुवक्ष पे कुपुत्र का प्रहार देख सत्य धर्म का न शेष एक भी सहारा है
लो उठा महान शस्त्र हाथ में तुरन्त मित्र आर्यखण्ड, आर्यदेश पूर्ण ये तुम्हारा है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 1 May 2013

कथा अपनी है


मै पुरुषार्थ करूँ तुम वैभव भोग करो उर ठान ठनी है
शक्ति तुम्ही मम के हित हो तुमसे मिल के मन नित्य धनी है
कण्टक हों न कभी पथ में जिस ओर चलो अभिलाष घनी है
प्रेम कहीं पर भी जब उद्धृत हो समझो कि कथा अपनी है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

पिया करते हैं


क्या श्रम है श्रम का न महत्त्व अरे श्रम दीन किया करते हैं
पीर न शान्त न भूख गई चिथड़े वह नित्य सिया करते हैं
शोषक तो सब भोग करें लख जीवन ऐश जिया करते हैं
क्यों श्रम की महिमा गहते मधु भी श्रमहीन पिया करते हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Tuesday, 30 April 2013

हरि राम कहो हरि कृष्ण कहो


सुन वृक्ष रहा जितना जग में अति प्राच्य वही तन ताप हरे
यदि माँ पितु को वय दान मिले तब जान कि ईश्वर पाप हरे
पर स्वार्थ भरा मन त्याग चला जनकों तक को सुख आप हरे
हरि राम कहो हरि कृष्ण कहो कलिकाल प्रभाव सुजाप हरे
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Monday, 29 April 2013

स्वाभिमान जा रहा



एक क्लीव को बना दिया है देश का प्रधान देख निर्विरोध बढ़ा शत्रु चला आ रहा
या कि पहुँचा दिया गया है ढेर अर्थ उसे चीन का बना दलाल शत्रु को बुला रहा
आ गया है वक्त मातृभूमि के ऋणों से मुक्ति का प्रयास हो कि काल वीर को जगा रहा
भारतीय भूमि का सुवक्ष रौंदता है चीन जाग वीर युद्ध छेड़ स्वाभिमान जा रहा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Sunday, 28 April 2013

पूर्ण चीन भारती का हो गया


चीन की घुस पैठ पर दो घनाक्षरी....स्नेह का आकांक्षी हूँ

मूर्ख क्या प्रधान देश का कि दे रहा बयान' दो न ध्यान ताल ठोंक चीन जो खड़ा हुआ
त्याग दो समस्त आन बान शान स्वाभिमान, अर्थ तो यही, स्वराष्ट्र लाज से गड़ा हुआ
राष्ट्र द्रोह के प्रमाण और भी मिले अनेक, किन्तु द्रोह साम्य अन्य भी कभी बड़ा हुआ
रक्त खौलने लगा, अपार क्रुद्ध देश आज, शत्रु शीश काट क्यों न फैसला कड़ा हुआ

भारतीय राजनीति का चरित्र देख आज चीन का प्रवेश राष्ट्र स्वाभिमान धो गया
लूटती चली गई हमें कुनीति और मित्र भारतीय आर्यवीर शक्ति भूल सो गया
जाग बगलामुखी जगा स्वदेश रक्त अम्ब खोज धूमावती राष्ट्र भाव कहाँ खो गया
धार के सहस्त्र हाथ में सहस्त्र ब्रह्म अस्त्र घोष हो कि पूर्ण चीन भारती का हो गया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य, लखनऊ

Thursday, 25 April 2013

बोलो बजरंगबली


हनुमान जयन्ती पर सभी को शुभ कामनाएँ

शंकर सुवन केसरी के आप नन्दन हो अञ्जनि सपूत प्रभु राम जी के प्यारे हो
धर्म रक्षणार्थ भूमि पर हो शरीर धारे कलि में प्रभावी सन्तमात्र के सहारे हो
दे दो सिद्धियाँ समस्त निधियाँ प्रदान करो बोलो बजरंगबली क्यों हमें बिसारे हो
दास रघुनाथ के हो सत्य है परन्तु सत्य यह भी कि नाथ प्रभु आप ही हमारे हो

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

आज अलंकृत आँगन है


देखिये श्रृंगार में अलंकार का चमत्कार

मन मीत मिला मनमोहक मादक मस्त महा मनभावन है
उजला उपवस्त्र उपासक सा उसका उपमान उषार्चन है
नख नैन निखार निहार कि नूपुर का नभ में नवनर्तन है
अब अम्बर अम्बुद आप्त अलौकिक आज अलंकृत आँगन है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 24 April 2013

सुपुष्प भी खिला नहीं


मै कहाँ कहाँ नहीं गया स्वधर्म रक्षणार्थ किन्तु एक भी सहायतार्थ है मिला नहीं
राष्ट्र का प्रसून दिव्य आज कुम्हला रहा परन्तु स्वार्थ वृत्ति से मनुष्य भी हिला नहीं
ये ध्वजा त्रिवर्ण स्वाभिमान हीन हो अपार जीर्ण शीर्ण सी प्रतीत हो इसे सिला नहीं
आसुरी प्रसार से अधर्म से महान कष्ट पा रही धरा यहाँ सुपुष्प भी खिला नहीं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Tuesday, 23 April 2013

बहाओ माँ


दौड़ आओ अम्ब व्यग्र हो रहा अतीव चित्त अंक में उठाओ आज वक्ष से लगाओ माँ
आ रहे नहीं विचार भी नवीन बुद्धि में कि शब्द रूप धार लेखनी में बैठ जाओ माँ
दो शिवत्व शक्ति दास को करो कृतार्थ नित्य लेखनी चले अभी विपंचिका बजाओ माँ
हस्तबद्ध प्रार्थना सुनो तुरन्त दास हेतु दिव्य दो प्रसाद धार काव्य की बहाओ माँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Monday, 22 April 2013

औकात नहीं है


कर ले कुछ भी अपने दम पे इतनी उसकी औकात नहीं है
तप योग नहीं उसके वश में इस हेतु बनी वो जात नहीं है
अब स्वार्थ पथी तुम भी तुमसे उसको मिलती सौगात नहीं है
उपकार कहो, अपशब्द भले कहता करता वो घात नहीं है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Saturday, 20 April 2013

बना समाज भेड़िया



देख लो मनुष्यता रही न आज शेष बन्धु आसुरी प्रवृत्ति वृद्धि दण्ड भी नहीं दिया
आर्य भू कलंकिनी बनी कि वेदना अपार वक्ष पे प्रहार किन्तु दंश घूँट क्यों पिया
जो रजस्वला हुई न बालिका अबोध देख शील लूटने लगा बना समाज भेड़िया
वेद वेद-अंग व्यर्थ हो गया समग्र शास्त्र क्योंकि आर्यधर्म का प्रसार ही नहीं किया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Friday, 19 April 2013

लगा कि चोर हो गई


माक्षिका सदा पवित्र ही कही गई परन्तु पश्चिमी प्रभाव में अशुद्ध घोर हो गई
कालचक्र  भारतीय टूटने लगा कि मित्र अर्धरात्रि में सुनो नवीन भोर हो गई
आर्य भू  महापराक्रमी सदा रही अतीव  किन्तु आज दीर्घसूत्रिता अछोर हो गई
वाक्य रक्षणार्थ प्राण त्याग की परम्परा न सूर्यवंश में दिखे लगे कि चोर हो गई
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Thursday, 18 April 2013

ठान है ठनी हुई


अर्थ लाभ सम्पदा मुझे न चाहिए परन्तु दान पुण्य यज्ञ हेतु कामना बनी हुई
क्या विडम्बना कि शान्ति चाहता असीम अम्ब किन्तु शत्रु दृष्टि व्यर्थ में रही तनी हुई
मै त्रिवर्ण केतु तान दूँ अधर्म हो विनष्ट दूँ मनुष्यता प्रसार ठान है ठनी हुई
और भारती सुभाल को सजा सकूँ अपूर्व दो महाबली बना कि चाह ये घनी हुई
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Wednesday, 17 April 2013

बता दो


सुनो भाग्य के हो विधाता तुम्ही किन्तु माया रही है भ्रमों को बढ़ा
यही वो नटी है नहीं जो नटी है सदा दण्ड क्यों मानवों पे मढ़ा
तुम्ही को भजा है सुनो ब्रह्म हो तो यही पाठ भी नित्य ही है पढ़ा
अरे दीन क्यों दीन है ये बता दो कहो भाग्य ऐसा गया क्यों गढ़ा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Tuesday, 16 April 2013

विलम्ब न और करो


रसना पर वास करो मुझको वर दो हर संकट आज हरो
नित नूतन छन्द सुमाल सजा मम लेखन में तुम नित्य भरो
यह अक्षम पुत्र सुनो जननी मुख में निज हस्त प्रसाद धरो
दृग बिन्दु भरे पद क्षालन को अब अम्ब विलम्ब न और करो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

बजरंगबली


ज्ञान सदैव रहा मन खोज बता मुझको वह कौन गली
दुर्गम जीवन है, लड़ता कितना युग से, कलिकाल छली
मै भव सागर पार करूँ किस भांति मिले वह नाव भली
नीर भरे दृग में यह दास सुनो अब तो बजरंगबली
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Monday, 15 April 2013

भटकी कब माया


व्यर्थ हुए सब वाद विवाद.......... नहीं उर में अपनापन आया
हो वसुधा न कुटुम्ब सकी निज शील बचा न सकी लख जाया
मानवधर्म न जान सका....... इतना भटका भटकी कब माया
क्यों धरती पर जन्म लिया... मन आज विचार बड़ा पछताया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

है विडम्बना


पूर्वजों के हरे प्राण धर्मभ्रष्टता प्रमाण
उनकी मज़ार हम चादर चढ़ा रहे
सत्ताधीश चाट रहे तलुए उन्ही के आज
और पाप द्रोह वाले  पाठ वे पढ़ा रहे
एक नर श्रेष्ठ धर्म मार्ग का पथी बना तो
उसके विरुद्ध झूठ भ्रामक गढ़ा रहे
है विडम्बना कि मंदिरों में जा घुसा उलूक
साईं बोल देवतुल्य मान भी बढ़ा रहे
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

घोर घमण्ड जिन्हें


जो धन या पदहीन रहा उसको...... जन त्रस्त किया करते हैं
हा! अपमान कुव्यंजन का नित सज्जन स्वाद लिया करते हैं
ज्ञान न पूजित है गुणवान....... उपेक्षित व्यर्थ जिया करते हैं
देख विसंगति घोर घमण्ड जिन्हें..... सब मान दिया करते हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

नारि सशक्त बनी


हर नारि सशक्त बनी इससे परचिन्तन देख नहीं करती
अब नेह सुमूर्ति नहीं लगती निज की वह तुष्टि सदा वरती
शिशु जन्म दिया पर वक्ष लगा अभिसिञ्चित दुग्ध नहीं भरती
तन सौष्ठव का नित ध्यान यहाँ वह आज अतीव सुनो धरती

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Friday, 12 April 2013

छला गया


धर्मनिरपेक्ष देश मेरा है बड़ा महान
ज्ञान तप दान त्याग भूलता चला गया
आसुरी प्रभाव से निभाई मित्रता सदैव
वेद का विशिष्ट ज्ञान बुद्धि से भला गया
मेरे घर घुसा द्रोही मेरा ही शिकार करें
गीदड़ों का वार व्याघ्र मति को जला गया
लोकतंत्र कब वंशतन्त्र हुआ ज्ञात नहीं
महान बता के हमें बहुत छला गया

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

माँ शारदा के श्री चरणों में समर्पित एक घनाक्षरी छंद------


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शक्ति भक्ति मुक्ति पथ की प्रदायिनी हो अम्ब
करुणा की मूर्ति नित्य ममता लुटाती हो
संकट में पड़े हुए भक्त की पुकार सुन
उसी क्षण वीणापाणि दौड़ी चली आती हो
धर्म के विनाश हेतु असुर बढे जो कोई
बन रणचण्डिका अनल बरसाती हो
हंस वाहिनी का रूप त्याग कर अम्ब तुम्ही
धारती हो शस्त्र सिंह वाहन बनाती हो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवी,ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

वर दे दो


यज्ञ बढ़े सुर शक्ति बढ़े तुम वेद ऋचा स्वर में भर दे दो
गौ द्विज भू करते अति पीड़ित जो उनके उर में डर दे दो
द्रोह करें जन दण्ड उन्हें स्वयमेव सुनो तुम आकर दे दो
हे चतुरानन जाय प्रणाम तुम्हे मुझको इतना वर दे दो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 10 April 2013

अपराजित नित्य रहूँगा


मै असुरत्व उपेक्षित मान..... सदा बन धर्म प्रवाह बहूँगा
अन्धड़ लक्ष चलें बड़वानल का नित निश्चित ताप सहूँगा
घातक वार अनेक करें अरि... सत्य सनातन धर्म गहूँगा
था अपराजित हूँ अपराजित ..मै अपराजित नित्य रहूँगा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

एक चेतावनी भरतवंशियों के लिए

नव संवत्सर की मंगल कामनाओं के साथ एक चेतावनी भरतवंशियों के लिए 

संवत्सर नया आ गया सनातनी परन्तु 
भगवा ध्वजा महत्ता आज घटने लगी
चैत्र नवरात्र का शुभारम्भ हो गया किन्तु
नई पीढ़ी परम्पराओं से कटने लगी 
तीर्थ मंदिरों में भीड़ हो रही अपार किन्तु 
शासकों की द्रोहियों के संग पटने लगी 
धर्म भूलने लगे हैं आज भारतीय वीर 
धरती से मानवीयता सिमटने लगी 

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Tuesday, 9 April 2013

ब्रह्म



उसी को गहो धर्मपन्थी बनो धर्म का हेतु सारा विशुद्ध्यर्थ है
तपस्या तथा योग हो दान या पुण्य भी कृत्य ये पूर्ण व्रत्यर्थ है
अरे वो दिए जा रहा है तुम्हे नित्य तो मान लो बन्धु अभ्यर्थ है
निराकार है या कि साकार है ब्रह्म पूँछो नहीं प्रश्न ये व्यर्थ है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

रहा करते थे

भारत में सब नेह सुबन्धन में बंध नित्य बहा करते थे
कारण सत्य सनातन धर्म सभी जन मित्र गहा करते थे
आ पहुँचा कलिकाल छली जिस भांति पुराण कहा करते थे
आज रमा धिक् भोग मनुष्य उसे वह त्याग रहा करते थे
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Monday, 8 April 2013

नरेन्द्र मोदी है


एक एक शत्रु राष्ट्र का अतीव भीरु बन्धु
है बना हुआ सुनो कि बुद्धि आज खो दी है
आर्य वीर जो उठा पराक्रमी महान देख
द्रोह में निमग्न जो प्रत्येक आँख रो दी है
राष्ट्रवाद का प्रसार हो गया दिशा दिशा व
अग्नि आसुरी बुझी कि राख भी भिगो दी है
मानवीयता विकास का व्रती चला सुपन्थ
व्याघ्र के समान आ रहा नरेन्द्र मोदी है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

औचित्य है


ज्ञान की रश्मियों को सहेजे सदा जो रहा सृष्टि में मात्र आदित्य है
मानवों को वही तो सुधा दान दे के सदा से किये बन्धु कृत्कृत्य है
झूमती है धरा झूमता व्योम भी तो उसी की कृपा से यहाँ नृत्य है
पृच्छकों जान लो धर्म को आज ये सूर्य को पूजने हेतु औचित्य है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

Sunday, 7 April 2013

विप्राह्वान


विश्वविखात साहित्यिक पत्रिका चेतना स्रोत में छपी मेरी एक रचना (पञ्चचामर छन्द में)



न राष्ट्र की सुवन्दना न हो पवित्र आरती
मनुष्यता निरीह वृत्ति आसुरी निहारती
तपो सुयज्ञ अग्नि में समाज सुप्त भारती
उठो कि अग्रजन्मनों धरा तुम्हे पुकारती

लखो कि यज्ञ त्याग से समाज सुप्त हो रहा
महापराक्रमी विशिष्ट आर्यवीर सो रहा
अधर्म का प्रसार भी विषाक्त बीज बो रहा
न सुप्त हो उठो कि विप्र आर्यखण्ड रो रहा

लखो कि आर्य नारियाँ बनी हुई शिकार हैं
अधर्म के विरुद्ध युद्ध के नहीं विचार हैं
नपुन्सकी कुराज्य में नपुन्सकी प्रसार हैं
उठो कि ऋत्विजों! बढे छली यहाँ हज़ार हैं

नहीं अभाव चन्द्रगुप्त का अनेक वीर हैं
परन्तु रिक्त हाथ हैं सजे न चाप तीर हैं
प्रभाव आसुरी बढे बढ़ी अपार पीर हैं
विलुप्त शक्तियां कि भारती लखो अधीर हैं

न लाल हो ललाट मातृभू न रक्त में सने
विवेक सुप्त है न भूसुरों रहो तने तने
करो प्रयास राष्ट्रशक्ति वीर ही यहाँ जने
सुमार्गदर्शकों समाज के तुम्ही रहो बने

समान दृष्टि हो कि शत्रु मित्र भेद हो नहीं
कुधान्य त्याग दो कुमार्ग को कभी गहो नहीं
त्रयग्नि छोड़ पाप धार में कभी बहो नहीं
बनो कि देवतुल्य अन्यथा यहाँ रहो नहीं

त्रिपुण्ड्र या कि उर्ध्वपुण्ड्र रोचना ललाट हो
शिखा धरो ललाम ग्रन्थि भी लगी विराट हो
खुला विवेक हेतु बुद्धि का रहे कपाट हो
अखण्ड राष्ट्र हो पुनः प्रभूत ठाट बाट हो

न मान दक्षिणा न द्रव्यदान भी तुम्हे मिले
डटे रहो परन्तु धर्म की ध्वजा सदा खिले
सदा समर्थ हो कि वेदमन्त्र जीत लें किले
दहाड़ दो कि पश्चिमी प्रभाव भी लगें हिले

तपो कि भारती सुभाल चारु चन्द्र गेह हो
वसिष्ठ के सामान क्षम्य वृत्ति और नेह हो
दधीचि के सामान त्याग हो कि वज्र देह हो
मरुस्थली निवास या कि उच्च भूमि लेह हो
१०
न उग्रवाद का प्रसार श्रेष्ठ वंश को डहे
लहू न एक बूँद भी द्विजों सुनो यहाँ बहे
उठो कि श्रोत्रियों सुहस्त ब्रह्मकर्म में रहे
करो सुकर्म विश्व आर्य भूमि वन्दना गहे
११
कहीं न रक्तपात हो कुटुम्ब हो वसुन्धरा
मनुष्यता प्रसार की सुदीर्घ हो परम्परा
समाज को सुज्ञान दो विशुद्ध स्वर्ण सा खरा
न चित्त काम क्रोध लोभ मोह से रहे भरा
१२
सदैव ध्यान ये धरो न वीरता विलोप हो
बलिष्ठ भारती सुपुत्र शस्त्रयुक्त गोप हो
अधर्म के कुचित्त में मनुष्य का प्रकोप हो
तनी खड़ी रहे ध्वजा प्रणाम हेतु तोप हो
१३
नया प्रभात हो समाज को सुमार्ग दो दिखा
कहो कि श्रेष्ठ ज्ञान मात्र वेद में गया लिखा
विनष्ट ज्ञान हो न आर्यश्रेष्ठ दो यही सिखा
प्रभाव नष्ट राक्षसी करो कि खोल दो शिखा
१४
समस्त देवता सुनो सनेह दृष्टियाँ धरें
अवश्य रिद्धि सिद्धि वृष्टि श्री गणेश जी करें
अभीष्ट प्राप्ति को त्रिदेव शक्ति बाहु में भरें
गभस्तिमान अन्धकार को सुनो तभी हरें

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

धारती हो शस्त्र सिंह वाहन बनाती हो




शक्ति भक्ति मुक्ति पथ की प्रदायिनी हो अम्ब
करुणा की मूर्ति नित्य ममता लुटाती हो
संकट में पड़े हुए भक्त की पुकार सुन
उसी क्षण वीणापाणि दौड़ी चली आती हो
धर्म के विनाश हेतु असुर बढे जो कोई
बन रणचण्डिका अनल बरसाती हो
हंस वाहिनी का रूप त्याग कर अम्ब तुम्ही
धारती हो शस्त्र सिंह वाहन बनाती हो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि,ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

धुन ले




देश अनेक प्रकार लुटे फिर भी चुप क्यों जनता सुन ले
सत्य यही सब स्वार्थपथी जितनी अब चाह यहीं चुन ले
पश्चिम लूट रहा तव बुद्धि समेत तुझे  उर में गुन ले
त्याग न देश अरे रुक जा निज राष्ट्रव्रती बन ये धुन ले
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Friday, 5 April 2013

राष्ट्र के निमित्त शारदा वन्दना


माँ तपोबली बना खड़ा करो मुझे असीम
मान देवशक्ति का प्रभूत मै बढ़ा सकूँ
अन्धकार गुम्फ में प्रविष्ट हो रहे अनेक
रोक के उन्हें स्वधर्म पाठ भी पढ़ा सकूँ
आर्य भूमि द्रोह में लगे हुए समस्त म्लेच्छ
हों विनष्ट वे सुवीर मूर्तियाँ  गढ़ा सकूँ
दो सहस्त्र व्याघ्रशक्ति युद्ध के निमित्त अम्ब
शत्रु शीश काट काट भोग में चढ़ा सकूँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

एक छंद माँ सिंहवाहिनी के श्री चरणों में


सभी मित्रों को नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ एक छंद माँ सिंहवाहिनी के श्री चरणों में निवेदित है. स्नेह का आकांक्षी हूँ

अम्ब आ गया है पर्व दिव्य नवरात्र वाला
साधना में घोर डूब जाऊँ यही वर दो
दानवों को आर्य मै बना सकूँ दो वरदान
ऐसी श्रेष्ठ वाणी तथा ऐसा दिव्य स्वर दो
आसुरी प्रभाव नष्ट हो सके वसुंधरा से
बलशाली व्याघ्र सम नख और कर दो
धर्मनिरपेक्षता का छद्म रूप धारे हुए
सत्तासीन राक्षसों के कंठ खड्ग धर दो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी
लखनऊ

माँ शारदा के श्री चरणों में समर्पित एक घनाक्षरी छंद-


शक्ति भक्ति मुक्ति पथ की प्रदायिनी हो अम्ब
करुणा की मूर्ति नित्य ममता लुटाती हो
संकट में पड़े हुए भक्त की पुकार सुन
उसी क्षण वीणापाणि दौड़ी चली आती हो
धर्म के विनाश हेतु असुर बढे जो कोई
बन रणचण्डिका अनल बरसाती हो
हंस वाहिनी का रूप त्याग कर अम्ब तुम्ही
धारती हो शस्त्र सिंह वाहन बनाती हो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि,ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

श्री गजानन वंदना

आप अग्रपूज्य अग्रगण्य हो गजानन हो
अमल वितुण्ड लिए बुद्धि के प्रदाता हो
रिद्धि सिद्धि संग रमते हो गणनायक हो
ब्रह्मचारी बलशाली विघ्न कष्टत्राता हो
अंकुश कुलिश कर वक्रतुण्ड गजकर्ण
एकदन्त दयासिन्धु और सर्वज्ञाता हो
उदर विशाल शोक हरते दयानिधान
मूषक सवारी में स्वधर्म के विधाता हो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच. डी.