Tuesday, 30 April 2013

हरि राम कहो हरि कृष्ण कहो


सुन वृक्ष रहा जितना जग में अति प्राच्य वही तन ताप हरे
यदि माँ पितु को वय दान मिले तब जान कि ईश्वर पाप हरे
पर स्वार्थ भरा मन त्याग चला जनकों तक को सुख आप हरे
हरि राम कहो हरि कृष्ण कहो कलिकाल प्रभाव सुजाप हरे
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Monday, 29 April 2013

स्वाभिमान जा रहा



एक क्लीव को बना दिया है देश का प्रधान देख निर्विरोध बढ़ा शत्रु चला आ रहा
या कि पहुँचा दिया गया है ढेर अर्थ उसे चीन का बना दलाल शत्रु को बुला रहा
आ गया है वक्त मातृभूमि के ऋणों से मुक्ति का प्रयास हो कि काल वीर को जगा रहा
भारतीय भूमि का सुवक्ष रौंदता है चीन जाग वीर युद्ध छेड़ स्वाभिमान जा रहा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Sunday, 28 April 2013

पूर्ण चीन भारती का हो गया


चीन की घुस पैठ पर दो घनाक्षरी....स्नेह का आकांक्षी हूँ

मूर्ख क्या प्रधान देश का कि दे रहा बयान' दो न ध्यान ताल ठोंक चीन जो खड़ा हुआ
त्याग दो समस्त आन बान शान स्वाभिमान, अर्थ तो यही, स्वराष्ट्र लाज से गड़ा हुआ
राष्ट्र द्रोह के प्रमाण और भी मिले अनेक, किन्तु द्रोह साम्य अन्य भी कभी बड़ा हुआ
रक्त खौलने लगा, अपार क्रुद्ध देश आज, शत्रु शीश काट क्यों न फैसला कड़ा हुआ

भारतीय राजनीति का चरित्र देख आज चीन का प्रवेश राष्ट्र स्वाभिमान धो गया
लूटती चली गई हमें कुनीति और मित्र भारतीय आर्यवीर शक्ति भूल सो गया
जाग बगलामुखी जगा स्वदेश रक्त अम्ब खोज धूमावती राष्ट्र भाव कहाँ खो गया
धार के सहस्त्र हाथ में सहस्त्र ब्रह्म अस्त्र घोष हो कि पूर्ण चीन भारती का हो गया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य, लखनऊ

Thursday, 25 April 2013

बोलो बजरंगबली


हनुमान जयन्ती पर सभी को शुभ कामनाएँ

शंकर सुवन केसरी के आप नन्दन हो अञ्जनि सपूत प्रभु राम जी के प्यारे हो
धर्म रक्षणार्थ भूमि पर हो शरीर धारे कलि में प्रभावी सन्तमात्र के सहारे हो
दे दो सिद्धियाँ समस्त निधियाँ प्रदान करो बोलो बजरंगबली क्यों हमें बिसारे हो
दास रघुनाथ के हो सत्य है परन्तु सत्य यह भी कि नाथ प्रभु आप ही हमारे हो

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

आज अलंकृत आँगन है


देखिये श्रृंगार में अलंकार का चमत्कार

मन मीत मिला मनमोहक मादक मस्त महा मनभावन है
उजला उपवस्त्र उपासक सा उसका उपमान उषार्चन है
नख नैन निखार निहार कि नूपुर का नभ में नवनर्तन है
अब अम्बर अम्बुद आप्त अलौकिक आज अलंकृत आँगन है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 24 April 2013

सुपुष्प भी खिला नहीं


मै कहाँ कहाँ नहीं गया स्वधर्म रक्षणार्थ किन्तु एक भी सहायतार्थ है मिला नहीं
राष्ट्र का प्रसून दिव्य आज कुम्हला रहा परन्तु स्वार्थ वृत्ति से मनुष्य भी हिला नहीं
ये ध्वजा त्रिवर्ण स्वाभिमान हीन हो अपार जीर्ण शीर्ण सी प्रतीत हो इसे सिला नहीं
आसुरी प्रसार से अधर्म से महान कष्ट पा रही धरा यहाँ सुपुष्प भी खिला नहीं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Tuesday, 23 April 2013

बहाओ माँ


दौड़ आओ अम्ब व्यग्र हो रहा अतीव चित्त अंक में उठाओ आज वक्ष से लगाओ माँ
आ रहे नहीं विचार भी नवीन बुद्धि में कि शब्द रूप धार लेखनी में बैठ जाओ माँ
दो शिवत्व शक्ति दास को करो कृतार्थ नित्य लेखनी चले अभी विपंचिका बजाओ माँ
हस्तबद्ध प्रार्थना सुनो तुरन्त दास हेतु दिव्य दो प्रसाद धार काव्य की बहाओ माँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Monday, 22 April 2013

औकात नहीं है


कर ले कुछ भी अपने दम पे इतनी उसकी औकात नहीं है
तप योग नहीं उसके वश में इस हेतु बनी वो जात नहीं है
अब स्वार्थ पथी तुम भी तुमसे उसको मिलती सौगात नहीं है
उपकार कहो, अपशब्द भले कहता करता वो घात नहीं है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Saturday, 20 April 2013

बना समाज भेड़िया



देख लो मनुष्यता रही न आज शेष बन्धु आसुरी प्रवृत्ति वृद्धि दण्ड भी नहीं दिया
आर्य भू कलंकिनी बनी कि वेदना अपार वक्ष पे प्रहार किन्तु दंश घूँट क्यों पिया
जो रजस्वला हुई न बालिका अबोध देख शील लूटने लगा बना समाज भेड़िया
वेद वेद-अंग व्यर्थ हो गया समग्र शास्त्र क्योंकि आर्यधर्म का प्रसार ही नहीं किया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Friday, 19 April 2013

लगा कि चोर हो गई


माक्षिका सदा पवित्र ही कही गई परन्तु पश्चिमी प्रभाव में अशुद्ध घोर हो गई
कालचक्र  भारतीय टूटने लगा कि मित्र अर्धरात्रि में सुनो नवीन भोर हो गई
आर्य भू  महापराक्रमी सदा रही अतीव  किन्तु आज दीर्घसूत्रिता अछोर हो गई
वाक्य रक्षणार्थ प्राण त्याग की परम्परा न सूर्यवंश में दिखे लगे कि चोर हो गई
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Thursday, 18 April 2013

ठान है ठनी हुई


अर्थ लाभ सम्पदा मुझे न चाहिए परन्तु दान पुण्य यज्ञ हेतु कामना बनी हुई
क्या विडम्बना कि शान्ति चाहता असीम अम्ब किन्तु शत्रु दृष्टि व्यर्थ में रही तनी हुई
मै त्रिवर्ण केतु तान दूँ अधर्म हो विनष्ट दूँ मनुष्यता प्रसार ठान है ठनी हुई
और भारती सुभाल को सजा सकूँ अपूर्व दो महाबली बना कि चाह ये घनी हुई
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Wednesday, 17 April 2013

बता दो


सुनो भाग्य के हो विधाता तुम्ही किन्तु माया रही है भ्रमों को बढ़ा
यही वो नटी है नहीं जो नटी है सदा दण्ड क्यों मानवों पे मढ़ा
तुम्ही को भजा है सुनो ब्रह्म हो तो यही पाठ भी नित्य ही है पढ़ा
अरे दीन क्यों दीन है ये बता दो कहो भाग्य ऐसा गया क्यों गढ़ा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Tuesday, 16 April 2013

विलम्ब न और करो


रसना पर वास करो मुझको वर दो हर संकट आज हरो
नित नूतन छन्द सुमाल सजा मम लेखन में तुम नित्य भरो
यह अक्षम पुत्र सुनो जननी मुख में निज हस्त प्रसाद धरो
दृग बिन्दु भरे पद क्षालन को अब अम्ब विलम्ब न और करो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

बजरंगबली


ज्ञान सदैव रहा मन खोज बता मुझको वह कौन गली
दुर्गम जीवन है, लड़ता कितना युग से, कलिकाल छली
मै भव सागर पार करूँ किस भांति मिले वह नाव भली
नीर भरे दृग में यह दास सुनो अब तो बजरंगबली
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Monday, 15 April 2013

भटकी कब माया


व्यर्थ हुए सब वाद विवाद.......... नहीं उर में अपनापन आया
हो वसुधा न कुटुम्ब सकी निज शील बचा न सकी लख जाया
मानवधर्म न जान सका....... इतना भटका भटकी कब माया
क्यों धरती पर जन्म लिया... मन आज विचार बड़ा पछताया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

है विडम्बना


पूर्वजों के हरे प्राण धर्मभ्रष्टता प्रमाण
उनकी मज़ार हम चादर चढ़ा रहे
सत्ताधीश चाट रहे तलुए उन्ही के आज
और पाप द्रोह वाले  पाठ वे पढ़ा रहे
एक नर श्रेष्ठ धर्म मार्ग का पथी बना तो
उसके विरुद्ध झूठ भ्रामक गढ़ा रहे
है विडम्बना कि मंदिरों में जा घुसा उलूक
साईं बोल देवतुल्य मान भी बढ़ा रहे
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

घोर घमण्ड जिन्हें


जो धन या पदहीन रहा उसको...... जन त्रस्त किया करते हैं
हा! अपमान कुव्यंजन का नित सज्जन स्वाद लिया करते हैं
ज्ञान न पूजित है गुणवान....... उपेक्षित व्यर्थ जिया करते हैं
देख विसंगति घोर घमण्ड जिन्हें..... सब मान दिया करते हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

नारि सशक्त बनी


हर नारि सशक्त बनी इससे परचिन्तन देख नहीं करती
अब नेह सुमूर्ति नहीं लगती निज की वह तुष्टि सदा वरती
शिशु जन्म दिया पर वक्ष लगा अभिसिञ्चित दुग्ध नहीं भरती
तन सौष्ठव का नित ध्यान यहाँ वह आज अतीव सुनो धरती

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Friday, 12 April 2013

छला गया


धर्मनिरपेक्ष देश मेरा है बड़ा महान
ज्ञान तप दान त्याग भूलता चला गया
आसुरी प्रभाव से निभाई मित्रता सदैव
वेद का विशिष्ट ज्ञान बुद्धि से भला गया
मेरे घर घुसा द्रोही मेरा ही शिकार करें
गीदड़ों का वार व्याघ्र मति को जला गया
लोकतंत्र कब वंशतन्त्र हुआ ज्ञात नहीं
महान बता के हमें बहुत छला गया

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

माँ शारदा के श्री चरणों में समर्पित एक घनाक्षरी छंद------


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शक्ति भक्ति मुक्ति पथ की प्रदायिनी हो अम्ब
करुणा की मूर्ति नित्य ममता लुटाती हो
संकट में पड़े हुए भक्त की पुकार सुन
उसी क्षण वीणापाणि दौड़ी चली आती हो
धर्म के विनाश हेतु असुर बढे जो कोई
बन रणचण्डिका अनल बरसाती हो
हंस वाहिनी का रूप त्याग कर अम्ब तुम्ही
धारती हो शस्त्र सिंह वाहन बनाती हो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवी,ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

वर दे दो


यज्ञ बढ़े सुर शक्ति बढ़े तुम वेद ऋचा स्वर में भर दे दो
गौ द्विज भू करते अति पीड़ित जो उनके उर में डर दे दो
द्रोह करें जन दण्ड उन्हें स्वयमेव सुनो तुम आकर दे दो
हे चतुरानन जाय प्रणाम तुम्हे मुझको इतना वर दे दो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 10 April 2013

अपराजित नित्य रहूँगा


मै असुरत्व उपेक्षित मान..... सदा बन धर्म प्रवाह बहूँगा
अन्धड़ लक्ष चलें बड़वानल का नित निश्चित ताप सहूँगा
घातक वार अनेक करें अरि... सत्य सनातन धर्म गहूँगा
था अपराजित हूँ अपराजित ..मै अपराजित नित्य रहूँगा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

एक चेतावनी भरतवंशियों के लिए

नव संवत्सर की मंगल कामनाओं के साथ एक चेतावनी भरतवंशियों के लिए 

संवत्सर नया आ गया सनातनी परन्तु 
भगवा ध्वजा महत्ता आज घटने लगी
चैत्र नवरात्र का शुभारम्भ हो गया किन्तु
नई पीढ़ी परम्पराओं से कटने लगी 
तीर्थ मंदिरों में भीड़ हो रही अपार किन्तु 
शासकों की द्रोहियों के संग पटने लगी 
धर्म भूलने लगे हैं आज भारतीय वीर 
धरती से मानवीयता सिमटने लगी 

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Tuesday, 9 April 2013

ब्रह्म



उसी को गहो धर्मपन्थी बनो धर्म का हेतु सारा विशुद्ध्यर्थ है
तपस्या तथा योग हो दान या पुण्य भी कृत्य ये पूर्ण व्रत्यर्थ है
अरे वो दिए जा रहा है तुम्हे नित्य तो मान लो बन्धु अभ्यर्थ है
निराकार है या कि साकार है ब्रह्म पूँछो नहीं प्रश्न ये व्यर्थ है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

रहा करते थे

भारत में सब नेह सुबन्धन में बंध नित्य बहा करते थे
कारण सत्य सनातन धर्म सभी जन मित्र गहा करते थे
आ पहुँचा कलिकाल छली जिस भांति पुराण कहा करते थे
आज रमा धिक् भोग मनुष्य उसे वह त्याग रहा करते थे
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Monday, 8 April 2013

नरेन्द्र मोदी है


एक एक शत्रु राष्ट्र का अतीव भीरु बन्धु
है बना हुआ सुनो कि बुद्धि आज खो दी है
आर्य वीर जो उठा पराक्रमी महान देख
द्रोह में निमग्न जो प्रत्येक आँख रो दी है
राष्ट्रवाद का प्रसार हो गया दिशा दिशा व
अग्नि आसुरी बुझी कि राख भी भिगो दी है
मानवीयता विकास का व्रती चला सुपन्थ
व्याघ्र के समान आ रहा नरेन्द्र मोदी है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

औचित्य है


ज्ञान की रश्मियों को सहेजे सदा जो रहा सृष्टि में मात्र आदित्य है
मानवों को वही तो सुधा दान दे के सदा से किये बन्धु कृत्कृत्य है
झूमती है धरा झूमता व्योम भी तो उसी की कृपा से यहाँ नृत्य है
पृच्छकों जान लो धर्म को आज ये सूर्य को पूजने हेतु औचित्य है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

Sunday, 7 April 2013

विप्राह्वान


विश्वविखात साहित्यिक पत्रिका चेतना स्रोत में छपी मेरी एक रचना (पञ्चचामर छन्द में)



न राष्ट्र की सुवन्दना न हो पवित्र आरती
मनुष्यता निरीह वृत्ति आसुरी निहारती
तपो सुयज्ञ अग्नि में समाज सुप्त भारती
उठो कि अग्रजन्मनों धरा तुम्हे पुकारती

लखो कि यज्ञ त्याग से समाज सुप्त हो रहा
महापराक्रमी विशिष्ट आर्यवीर सो रहा
अधर्म का प्रसार भी विषाक्त बीज बो रहा
न सुप्त हो उठो कि विप्र आर्यखण्ड रो रहा

लखो कि आर्य नारियाँ बनी हुई शिकार हैं
अधर्म के विरुद्ध युद्ध के नहीं विचार हैं
नपुन्सकी कुराज्य में नपुन्सकी प्रसार हैं
उठो कि ऋत्विजों! बढे छली यहाँ हज़ार हैं

नहीं अभाव चन्द्रगुप्त का अनेक वीर हैं
परन्तु रिक्त हाथ हैं सजे न चाप तीर हैं
प्रभाव आसुरी बढे बढ़ी अपार पीर हैं
विलुप्त शक्तियां कि भारती लखो अधीर हैं

न लाल हो ललाट मातृभू न रक्त में सने
विवेक सुप्त है न भूसुरों रहो तने तने
करो प्रयास राष्ट्रशक्ति वीर ही यहाँ जने
सुमार्गदर्शकों समाज के तुम्ही रहो बने

समान दृष्टि हो कि शत्रु मित्र भेद हो नहीं
कुधान्य त्याग दो कुमार्ग को कभी गहो नहीं
त्रयग्नि छोड़ पाप धार में कभी बहो नहीं
बनो कि देवतुल्य अन्यथा यहाँ रहो नहीं

त्रिपुण्ड्र या कि उर्ध्वपुण्ड्र रोचना ललाट हो
शिखा धरो ललाम ग्रन्थि भी लगी विराट हो
खुला विवेक हेतु बुद्धि का रहे कपाट हो
अखण्ड राष्ट्र हो पुनः प्रभूत ठाट बाट हो

न मान दक्षिणा न द्रव्यदान भी तुम्हे मिले
डटे रहो परन्तु धर्म की ध्वजा सदा खिले
सदा समर्थ हो कि वेदमन्त्र जीत लें किले
दहाड़ दो कि पश्चिमी प्रभाव भी लगें हिले

तपो कि भारती सुभाल चारु चन्द्र गेह हो
वसिष्ठ के सामान क्षम्य वृत्ति और नेह हो
दधीचि के सामान त्याग हो कि वज्र देह हो
मरुस्थली निवास या कि उच्च भूमि लेह हो
१०
न उग्रवाद का प्रसार श्रेष्ठ वंश को डहे
लहू न एक बूँद भी द्विजों सुनो यहाँ बहे
उठो कि श्रोत्रियों सुहस्त ब्रह्मकर्म में रहे
करो सुकर्म विश्व आर्य भूमि वन्दना गहे
११
कहीं न रक्तपात हो कुटुम्ब हो वसुन्धरा
मनुष्यता प्रसार की सुदीर्घ हो परम्परा
समाज को सुज्ञान दो विशुद्ध स्वर्ण सा खरा
न चित्त काम क्रोध लोभ मोह से रहे भरा
१२
सदैव ध्यान ये धरो न वीरता विलोप हो
बलिष्ठ भारती सुपुत्र शस्त्रयुक्त गोप हो
अधर्म के कुचित्त में मनुष्य का प्रकोप हो
तनी खड़ी रहे ध्वजा प्रणाम हेतु तोप हो
१३
नया प्रभात हो समाज को सुमार्ग दो दिखा
कहो कि श्रेष्ठ ज्ञान मात्र वेद में गया लिखा
विनष्ट ज्ञान हो न आर्यश्रेष्ठ दो यही सिखा
प्रभाव नष्ट राक्षसी करो कि खोल दो शिखा
१४
समस्त देवता सुनो सनेह दृष्टियाँ धरें
अवश्य रिद्धि सिद्धि वृष्टि श्री गणेश जी करें
अभीष्ट प्राप्ति को त्रिदेव शक्ति बाहु में भरें
गभस्तिमान अन्धकार को सुनो तभी हरें

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

धारती हो शस्त्र सिंह वाहन बनाती हो




शक्ति भक्ति मुक्ति पथ की प्रदायिनी हो अम्ब
करुणा की मूर्ति नित्य ममता लुटाती हो
संकट में पड़े हुए भक्त की पुकार सुन
उसी क्षण वीणापाणि दौड़ी चली आती हो
धर्म के विनाश हेतु असुर बढे जो कोई
बन रणचण्डिका अनल बरसाती हो
हंस वाहिनी का रूप त्याग कर अम्ब तुम्ही
धारती हो शस्त्र सिंह वाहन बनाती हो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि,ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

धुन ले




देश अनेक प्रकार लुटे फिर भी चुप क्यों जनता सुन ले
सत्य यही सब स्वार्थपथी जितनी अब चाह यहीं चुन ले
पश्चिम लूट रहा तव बुद्धि समेत तुझे  उर में गुन ले
त्याग न देश अरे रुक जा निज राष्ट्रव्रती बन ये धुन ले
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Friday, 5 April 2013

राष्ट्र के निमित्त शारदा वन्दना


माँ तपोबली बना खड़ा करो मुझे असीम
मान देवशक्ति का प्रभूत मै बढ़ा सकूँ
अन्धकार गुम्फ में प्रविष्ट हो रहे अनेक
रोक के उन्हें स्वधर्म पाठ भी पढ़ा सकूँ
आर्य भूमि द्रोह में लगे हुए समस्त म्लेच्छ
हों विनष्ट वे सुवीर मूर्तियाँ  गढ़ा सकूँ
दो सहस्त्र व्याघ्रशक्ति युद्ध के निमित्त अम्ब
शत्रु शीश काट काट भोग में चढ़ा सकूँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

एक छंद माँ सिंहवाहिनी के श्री चरणों में


सभी मित्रों को नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ एक छंद माँ सिंहवाहिनी के श्री चरणों में निवेदित है. स्नेह का आकांक्षी हूँ

अम्ब आ गया है पर्व दिव्य नवरात्र वाला
साधना में घोर डूब जाऊँ यही वर दो
दानवों को आर्य मै बना सकूँ दो वरदान
ऐसी श्रेष्ठ वाणी तथा ऐसा दिव्य स्वर दो
आसुरी प्रभाव नष्ट हो सके वसुंधरा से
बलशाली व्याघ्र सम नख और कर दो
धर्मनिरपेक्षता का छद्म रूप धारे हुए
सत्तासीन राक्षसों के कंठ खड्ग धर दो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी
लखनऊ

माँ शारदा के श्री चरणों में समर्पित एक घनाक्षरी छंद-


शक्ति भक्ति मुक्ति पथ की प्रदायिनी हो अम्ब
करुणा की मूर्ति नित्य ममता लुटाती हो
संकट में पड़े हुए भक्त की पुकार सुन
उसी क्षण वीणापाणि दौड़ी चली आती हो
धर्म के विनाश हेतु असुर बढे जो कोई
बन रणचण्डिका अनल बरसाती हो
हंस वाहिनी का रूप त्याग कर अम्ब तुम्ही
धारती हो शस्त्र सिंह वाहन बनाती हो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि,ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

श्री गजानन वंदना

आप अग्रपूज्य अग्रगण्य हो गजानन हो
अमल वितुण्ड लिए बुद्धि के प्रदाता हो
रिद्धि सिद्धि संग रमते हो गणनायक हो
ब्रह्मचारी बलशाली विघ्न कष्टत्राता हो
अंकुश कुलिश कर वक्रतुण्ड गजकर्ण
एकदन्त दयासिन्धु और सर्वज्ञाता हो
उदर विशाल शोक हरते दयानिधान
मूषक सवारी में स्वधर्म के विधाता हो

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच. डी.