Sunday, 7 April 2013

विप्राह्वान


विश्वविखात साहित्यिक पत्रिका चेतना स्रोत में छपी मेरी एक रचना (पञ्चचामर छन्द में)



न राष्ट्र की सुवन्दना न हो पवित्र आरती
मनुष्यता निरीह वृत्ति आसुरी निहारती
तपो सुयज्ञ अग्नि में समाज सुप्त भारती
उठो कि अग्रजन्मनों धरा तुम्हे पुकारती

लखो कि यज्ञ त्याग से समाज सुप्त हो रहा
महापराक्रमी विशिष्ट आर्यवीर सो रहा
अधर्म का प्रसार भी विषाक्त बीज बो रहा
न सुप्त हो उठो कि विप्र आर्यखण्ड रो रहा

लखो कि आर्य नारियाँ बनी हुई शिकार हैं
अधर्म के विरुद्ध युद्ध के नहीं विचार हैं
नपुन्सकी कुराज्य में नपुन्सकी प्रसार हैं
उठो कि ऋत्विजों! बढे छली यहाँ हज़ार हैं

नहीं अभाव चन्द्रगुप्त का अनेक वीर हैं
परन्तु रिक्त हाथ हैं सजे न चाप तीर हैं
प्रभाव आसुरी बढे बढ़ी अपार पीर हैं
विलुप्त शक्तियां कि भारती लखो अधीर हैं

न लाल हो ललाट मातृभू न रक्त में सने
विवेक सुप्त है न भूसुरों रहो तने तने
करो प्रयास राष्ट्रशक्ति वीर ही यहाँ जने
सुमार्गदर्शकों समाज के तुम्ही रहो बने

समान दृष्टि हो कि शत्रु मित्र भेद हो नहीं
कुधान्य त्याग दो कुमार्ग को कभी गहो नहीं
त्रयग्नि छोड़ पाप धार में कभी बहो नहीं
बनो कि देवतुल्य अन्यथा यहाँ रहो नहीं

त्रिपुण्ड्र या कि उर्ध्वपुण्ड्र रोचना ललाट हो
शिखा धरो ललाम ग्रन्थि भी लगी विराट हो
खुला विवेक हेतु बुद्धि का रहे कपाट हो
अखण्ड राष्ट्र हो पुनः प्रभूत ठाट बाट हो

न मान दक्षिणा न द्रव्यदान भी तुम्हे मिले
डटे रहो परन्तु धर्म की ध्वजा सदा खिले
सदा समर्थ हो कि वेदमन्त्र जीत लें किले
दहाड़ दो कि पश्चिमी प्रभाव भी लगें हिले

तपो कि भारती सुभाल चारु चन्द्र गेह हो
वसिष्ठ के सामान क्षम्य वृत्ति और नेह हो
दधीचि के सामान त्याग हो कि वज्र देह हो
मरुस्थली निवास या कि उच्च भूमि लेह हो
१०
न उग्रवाद का प्रसार श्रेष्ठ वंश को डहे
लहू न एक बूँद भी द्विजों सुनो यहाँ बहे
उठो कि श्रोत्रियों सुहस्त ब्रह्मकर्म में रहे
करो सुकर्म विश्व आर्य भूमि वन्दना गहे
११
कहीं न रक्तपात हो कुटुम्ब हो वसुन्धरा
मनुष्यता प्रसार की सुदीर्घ हो परम्परा
समाज को सुज्ञान दो विशुद्ध स्वर्ण सा खरा
न चित्त काम क्रोध लोभ मोह से रहे भरा
१२
सदैव ध्यान ये धरो न वीरता विलोप हो
बलिष्ठ भारती सुपुत्र शस्त्रयुक्त गोप हो
अधर्म के कुचित्त में मनुष्य का प्रकोप हो
तनी खड़ी रहे ध्वजा प्रणाम हेतु तोप हो
१३
नया प्रभात हो समाज को सुमार्ग दो दिखा
कहो कि श्रेष्ठ ज्ञान मात्र वेद में गया लिखा
विनष्ट ज्ञान हो न आर्यश्रेष्ठ दो यही सिखा
प्रभाव नष्ट राक्षसी करो कि खोल दो शिखा
१४
समस्त देवता सुनो सनेह दृष्टियाँ धरें
अवश्य रिद्धि सिद्धि वृष्टि श्री गणेश जी करें
अभीष्ट प्राप्ति को त्रिदेव शक्ति बाहु में भरें
गभस्तिमान अन्धकार को सुनो तभी हरें

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

4 comments:

  1. आसुतोष वाजपेयीजी !
    पथ इंगित करने वाली इतनी भाव-प्रवण रचना के लिए कोटिशः बधाई.

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