Thursday, 9 May 2013

माँ की महानता का एक चित्र देखिये


पुलक उठा था तन मन अंग अंग मेरा जब प्रिय पुत्र गर्भ मध्य तू समाया था
पद जननी का किया तूने ही प्रदान मुझे थी अपूर्ण पूर्ण मुझे तूने ही बनाया था
हँस हँस के सदैव लोरियां सुनाईं तुझे निज तुष्टि हेतु तुझे वक्ष से लगाया था
जग कहे ऋणी पुत्र को सदैव माँ का किन्तु ऋणभार तूने पुत्र मुझपे चढ़ाया था
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

4 comments:

  1. अप्रतिम! बहुत सुन्दर!

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  2. आपके छंदों का जवाब नहीं! शब्द सरिता की तरह बहते हैं ।
    - सी एम उपाध्याय "शून्य आकांक्षी"

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  3. bahut abhaar सी एम उपाध्याय ji

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