Tuesday, 13 August 2013

कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

शत्रु चारों ओर से प्रहार है करे
एक भारतीय देख नित्य ही मरे
सत्ताधीश हमें लूट घर को भरे
पूर्ण चैन राष्ट्र का खड़े खड़े हरे
वीरता प्रसंग रहे धरे के धरे
लेखनी से निकलेंगे वचन खरे

शौर्य का उठो प्रवीण छेड़ राग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

सीमा पर शत्रु का जमावड़ा बड़ा
जाने क्यों न फूटे अब पाप का घड़ा
वीर आर्यपुत्र मोह छोड़ के लड़ा
किन्तु शीर्ष देश का है निष्क्रिय खड़ा
लज्जावश राष्ट्र लगा भूमि में गड़ा
लेना होगा तुम्हे आज फैसला कड़ा

राष्ट्र धर्म के निमित्त आशु भाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

आम्भि जयचन्द व ओवैसी बढ़ते
राजनेता स्वार्थ के कुपन्थ गढ़ते
राष्ट्रद्रोही घातकर्म पाठ पढ़ते
शेर पे तभी तो हैं सियार चढ़ते
भारती को डायन बताते कढ़ते
और दोष हम पे वो नित्य मढ़ते

सन्तति में वीरता के रस पाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ