Friday, 18 December 2015

राज्य राजा न कोई यहाँ रंक हो।

राज्य राजा न कोई यहाँ रंक हो।
विश्व में प्रेम हो नष्ट आतंक हो।
सौख्यदा निर्मला मृत्तिका हो सके,
यो लगे माँ लिए सर्वदा अंक हो।
सत्य का, धर्म का जो पथी हो बना,
वो नहीं वेश को त्याग के कंक हो।
पंकजों सी खिले जीव की चेतना,
नित्य आधार चाहे बना पंक हो।
'आशु' दे हर्ष जो वक्ष को चन्द्रिका,
वो मिले हर्ष चाहे चुभा डंक हो।
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ