Thursday, 31 March 2016

न यों बेशर्म था।


जो किया था राम ने वो कर्म था।
या मनुष्यों हेतु कोई धर्म था।
कौन है जाना भला उद्देश्य को,
भूलता क्यों है उसे जो मर्म था।
क्र्रूरता तो देख ले तू चित्त की,
पूर्व में कोई न यों बेशर्म था।
चोट ठण्डा लौह ही दे लौह पे,
लौह काटा वो गया जो गर्म था।
'आशु' क्या होगा न सोचो और भी,
प्राण से महंगा कभी क्या चर्म था।
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

No comments:

Post a Comment